युगों युगान्तर से मानव कल्याण के लिए पुराणों में यह उल्लेख मिलता है कि जब जब मनुष्य रूपी प्राणी ही नहीं वरन ब्रह्माण्ड के सभी प्राणियों पर जब जब आसुरि शक्तियों के तरफ से आक्रमण किया गया या किसी तरह की कोई विपदा आयी ,तब तब ॐ शक्ति ने विभिन्न रूपो में धरती पर अवतरित होकर मनुष्य को अधर्म पर धर्म की विजय दिलाकर धर्म कर्म के रास्ते पर चलने का मार्ग प्रसस्त किया । इसके साथ ही अलग अलग नामो से विख्यात होकर मानव जीवन के कल्याण के लिए प्रेणना के स्त्रोत बने ।
त्रेतायुग में विश्व की राजधानी अयोध्या नरेश महाराज दशरथ और महारानी कौशल्या के पुत्र के रूप में साक्षात् भगवान् विष्णु ने अवतार लिया । श्रीरामचरितमानस के सभी कांडों में गोस्वामी तुलसीदास ने श्री राम के चरित्र का वर्णन कुछ इस प्रकार किया है कि जो भी श्रीरामचरितमानस का पाठ करेगा वह मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम के आदर्श जीवन की लीलाओं से खुद को परिपूर्ण कर लेगा । जिस तरह कहा गया है कि रघुकुल रीती सदा चली आयी ,प्राण जाए पर वचन ना जाए को यथार्थ करते हुए माता कैकयी के वचन का पालन किया । महापंडित महाज्ञानी लंकापति लंकेश्वर रावण को युद्ध में परास्त कर अयोध्या लौटे । श्री राम ने सभी कर्तव्यों का पालन करते हुए क्षत्रिय धर्म के साथ एक श्रेष्ठ पुत्र पति पिता व् भ्राता के साथ साथ अयोध्या की प्रजा के राजा बन संपूर्ण विश्व का उद्धार किया।
तभी से अयोध्या ही नहीं विश्व में रामलीला भव्यता से मनाई जाती है इतना ही नहीं हर कोई पुरुषोत्तम श्री राम के रूप में बालक की प्राप्ति चाहते है ,बावजूद इसके कोई भी अपने बच्चो को रामलीला के मंचन देखने नहीं भेजना चाहता । जिसके चलते बदलते परिवेश में रामलीला ओझल होती जा रही है । जहाँ कही प्राचीनतम परंपराओं को निभाते हुए रामलीला का मंचन किया जा रहा है वही कुछ रामलीला दूसरे त्योहारों की अपेक्षा कम होती जा रही है । देखा जा रहा है कि लोग श्री राम के चरित्र के दर्शन से कटते जा रहे है । विडम्बना तो यह है कि आज की रामलीला महज गिनती में सीमित रह गयी है । भगवान श्री राम के आदर्शों से दूर हो रहे लोग रामराज्य की कल्पना तो जरूर कर रहे है लेकिन रामलीला में सम्मलित होने से कतराते है । लंकेश्वर रावण का बुराई पर अच्छाई असत्य पर सत्य की विजय का दहन तो कर दिया जाता है लेकिन अपने हृदय में कोई श्री राम के आदर्शों को नहीं उतार रहा है । रामलीला के अस्तित्व को ख़त्म होने से बचाना है और श्री राम के चरित्र से प्रेणना लेकर रामराज्य की स्थापना करनी है । इतना ही नहीं आने वाली पीढ़ी को श्री राम पुरुषार्थ के चरित्र का वर्णन कर मानव कल्याण में अपना सहयोग देना है ।
तभी से अयोध्या ही नहीं विश्व में रामलीला भव्यता से मनाई जाती है इतना ही नहीं हर कोई पुरुषोत्तम श्री राम के रूप में बालक की प्राप्ति चाहते है ,बावजूद इसके कोई भी अपने बच्चो को रामलीला के मंचन देखने नहीं भेजना चाहता । जिसके चलते बदलते परिवेश में रामलीला ओझल होती जा रही है । जहाँ कही प्राचीनतम परंपराओं को निभाते हुए रामलीला का मंचन किया जा रहा है वही कुछ रामलीला दूसरे त्योहारों की अपेक्षा कम होती जा रही है । देखा जा रहा है कि लोग श्री राम के चरित्र के दर्शन से कटते जा रहे है । विडम्बना तो यह है कि आज की रामलीला महज गिनती में सीमित रह गयी है । भगवान श्री राम के आदर्शों से दूर हो रहे लोग रामराज्य की कल्पना तो जरूर कर रहे है लेकिन रामलीला में सम्मलित होने से कतराते है । लंकेश्वर रावण का बुराई पर अच्छाई असत्य पर सत्य की विजय का दहन तो कर दिया जाता है लेकिन अपने हृदय में कोई श्री राम के आदर्शों को नहीं उतार रहा है । रामलीला के अस्तित्व को ख़त्म होने से बचाना है और श्री राम के चरित्र से प्रेणना लेकर रामराज्य की स्थापना करनी है । इतना ही नहीं आने वाली पीढ़ी को श्री राम पुरुषार्थ के चरित्र का वर्णन कर मानव कल्याण में अपना सहयोग देना है ।
आभार
अभिषेक सावन्त श्रीवास्तव
अभिषेक सावन्त श्रीवास्तव


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