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Wednesday, 27 December 2017

कल्पनाओं के गांव का स्वाद चखते नगरवासी ...



कहा जाता है तीनो लोको का स्वर्ग कही परिलिक्षित होता है तो वह है "गांव" । जी हां ये मैं नही कह रहा ,हमारे धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चारो वेद , पुराणों ,महाकाव्यों के साथ हिंदी ,साहित्यकारों की रचनाओं में गांव एकसुर में बसता है। जिसके दर्शन को स्वयं देवता स्वर्ग से गाँव खेत खलिहानों के विचरण को धरती पर आते है और भाव विभोर होकर स्वर्ग लोक में धरती के स्वर्ग का बखान करते है जिसका वर्णन पुराणों में लिखा गया है।  


विश्व मे भारत देश को कृषि प्रधान देश की संज्ञा दी गयी है । क्योंकि आज भी भारत देश मे गाँवों में सबसे ज्यादा आबादी निवास करती है जोकि व्यवसाय ,उद्योग ,खेती से अनाज उगाना जैसे अनेक संसाधनों से परिपूर्ण रहे है लेकिन जैसे जैसे समय बदलता गया ,नए परिवेश में व्यक्ति ने गाँवों से पलायन कर नगरों में उस व्यवसाय की खोज शुरू कर दी जोकि गाँवों में प्राचीनकाल से मौजूद है । विडंबना यह है कि व्यक्ति के सामने जो कुछ होता है वह उसे स्वीकार ना करके उस तरफ़ भागता है जहां जाने पर वह कभी नही लौटता । 


जी हां मेरा कहना इसलिए उचित हो सकता है क्योंकि आज मैंने कुछ ऐसा ही महसूस किया । गाँवों से नगरों में पयालन कर रह रहे लोगो मे गाँवों की संस्कृति को करीब से जुड़ते देखा । मिट्टी के घरों में तांक झांक तो कभी गायों के बछिया के साथ खेलना और फिर गांव के मध्य में बने शिव मंदिर पर नतमस्तक होना।  जहां ना कोई धर्म दिखा ना कोई जातिपाति । लेकिन यह क्या ....यह तो छणिक भर के लिए कल्पना मात्र का वह गांव जिसको प्रदर्शनी में प्रदर्शित किया गया है में जोकि एक समय अंतराल के बाद उजड़ जाएगा । 

प्रदर्शनी में आये एक वरिस्ठ नागरिक से मैंने उत्सुकता से जानना चाहा कि क्या यह वही गांव है जिसमे आपका बचपन बीता । तकरीबन 90 वर्ष के हो चुके बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए कहा यह दुर्भाग्य है कि आज गाँवों की सुंदरता को छोड़ आये लोग प्रदर्शनी में गाँवों के स्वाद को चखने का प्रयास करते है ।

  उत्सुकता इतनी की मैं तस्वीरों में मशगूल हो गया कि अचानक एक तकरीबन 15 वर्ष की छोटी बच्ची ने मेरे प्रश्नों के एक जवाब में कहा कि गाँवों में भी नगरों की तरह सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए । जिनके साथ उनकी माँ ने भी बिटिया के सुर में सुर मिलाये । 

सवाल यह उठता है कि क्या क्षणिक भर की कल्पनाओं से ही स्वर्ग दर्जा प्राप्त गाँवों की सूरत बदली जा सकती है। नगरों में लगने वाली प्रदर्शनियों में सेल्फी लेने वाले लोग गाँवों में जाना आखिर क्यों पसंद नही करते ....इन सवालों के जवाब की तलाश अब जरूर शुरू हो गयी है .....



धन्यवाद

(लेखक के अपने विचार)

अभिषेक सावन्त श्रीवास्तव

#कृपया_अपने_विचार_जरूर_साझा_करें ।

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